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जानिए कुंभ के अखाड़ों का इतिहास

कुंभ और अर्धकुंभ में अखाड़ों का विशेष महत्व होता है. यह अखाड़े हैं क्या? इनकी परंपरा क्या है? इस सबके पीछे बहुत ही महत्‍वपूर्ण इतिहास है.

क्‍या है अखाड़ा

अखाड़ों की स्थापना क्रम शैव, वैष्णव और उदासीन पंथ के संन्यासियों के मान्यता प्राप्त कुल 13 अखाड़े हैं. अखाड़ों का संचालन पहले आश्रमों के अखाड़ों को बेड़ा अर्थात साधुओं का जत्था कहा जाता था. पहले अखाड़ा शब्द का चलन नहीं था. साधुओं के जत्थे में पीर और तद्वीर होते थे. अखाड़ों का इतिहास अखाड़ा शब्द का चलन मुगलकाल से शुरू हुआ. अखाड़ा साधुओं का वह दल है जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है. अखाड़ों का इतिहास कुछ विद्वानों का मानना है कि अलख शब्द से ही अखाड़ा शब्द बना है. कुछ मानते हैं कि अक्खड़ से या आश्रम से.

अखाड़ों का इतिहास

अखाड़ा नाम लेते ही दिमाग में एक अलग छवि उभरती है। वह छवि होती है पुलपुली जमीन पर मिट्टी में सने पहलवान एक-दूसरे पर कुश्ती के दांव आजमाते हुए। कुंभ में अखाड़े हमारे देश में इसकी पुरानी परंपरा रही है। साधु समाज में वही परंपरा दूसरे रूप में आई। अखाड़ों का इतिहास इसकी शुरुआत आदि शंकराचार्य ने उस समय की  जब सनातन धर्म पर विधर्मी शक्तियां जोर आजमाइश कर रही थीं। शंकराचार्य ने तभी शारीरिक रूप से बलिष्ठ साधुओं को एकत्र कर सनातन धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ा बनाया।

अखाड़ों का संचालन सधुक्कड़ी भाषा में अखाड़ा उसे कहते हैं जहां साधुओं का जमावड़ा रहता है। सीधे सपाट शब्दों में कहें तो अखाड़े शंकराचार्य की सेना के रूप में थे, जिन्हें धर्म की रक्षा के लिए तैनात किया गया था। एक हाथ में माला और एक हाथ में भाला वाले सिद्धांत पर इन्हें शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा दी गई। व्यवस्था बनाई गई कि शंकराचार्य या उनके द्वारा नामित आचार्य जब कभी सनातन धर्म की रक्षा के लिए इन अखाड़ों को शस्त्र उठाने का आदेश देंगे, यह अपना काम करेंगे।

यानी सेना जैसा आचरण कि सेनापति या मुखिया के आदेश के बिना जैसे अपने विवेक से सेना कोई कार्रवाई नहीं कर सकती, अखाड़े भी मनमाना निर्णय नहीं ले सकते। ये अखाड़े कुंभ मेले के अवसर पर कुंभ स्थलों पर डेरा डालते हैं और शंकराचार्यों व अपने-अपने अखाड़े के महामंडलेश्वरों की अगुवाई में विशेष स्नान पर्वों पर स्नान करते हैं। इसी को शाही स्नान कहा जाता है।

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अखाड़ों का इतिहास अखाड़ों के मुखिया के रूप में महंत, श्रीमहंत जैसे पद होते हैं। इनके ऊपर महामंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर के पद होते हैं। शास्त्रीय पांडित्य और योग्यतानुसार इनको पद दिए जाते हैं। अखाड़ों की स्थापना क्रम यह परंपरा 18वीं शताब्दी में शुरू हुई थी। महामंडलेश्वर प्राय: बड़े यानी पैसे वाले संत बनाए जाते हैं जो अखाड़ों का खर्च भी उठाते हैं। समाज में उनका सम्मान भी ज्यादा होता है।

अखाड़ों की स्थापना क्रम एक एक अखाड़े में कई महामंडलेश्वर हो सकते हैं पर आचार्य महामंडलेश्वर का पद एक ही होता है। अखाड़ों का इतिहास अखाड़ों से जुड़े संतों के अनुसार 2001 तक अखाड़ों में 100 के करीब महामंडलेश्वर थे। कुंभ में अखाड़े 2013 के प्रयाग कुंभ में यह संख्या 300 तक पहुंच गई थी। ऐसे ही वैष्णव अखाड़ों के महामंडलेश्वरों की संख्या 2013 के प्रयाग कुंभ में 700 तक बताई गई है।

कुंभ में अखाड़े

कुंभ में अखाड़े हिंदू धर्म की रक्षा का कार्य तो अखाड़े आज भी करते आ रहे हैं।अखाड़ों का संचालन प्रत्येक कुंभ में छोटे बड़े सभी अखाड़े अपना तंबू लगाते हैं। कुंभ को तबुओं का शहर कहा जाता है। पहले अखाड़े वास्तव में साधारण तंबू लगाते थे और साधु रेती पर धुनी जमाते थे। आज कुंभ मेले में ऐसा दृश्य मिलना मुशिकल है। अब अखाड़े शानदार तंबू लगाते हैं जहां बहुत तरह की सुविधाएं हैं। भूमि पूजन के पश्चात ही सभी अखाड़े रहने की व्यवस्था में जुट जाते हैं। अखाड़ों में साधु सन्यासियों के अलावा भक्तों की भी अच्छी खासी संख्या होती है। अखाड़ों का संचालन बहुत लोग इन अखाड़ों के सहयोग से ही कुंभ में निर्विघ्न प्रवास एवं स्नान करते हैं। अखाड़ों में निशुल्क भोजन का भी वितरण किया जाता है।

मूलत: कुम्भ या अर्धकुम्भ में साधु-संतों के कुल तेरह अखाड़ों द्वारा भाग लिया जाता है। इन अखाड़ों की प्राचीन काल से ही स्नान पर्व की परंपरा चली आ रही है। इन अखाड़ों के नाम है :-

कुंभ में अखाड़े शिव संन्यासी संप्रदाय के 7 अखाड़े :

  1. श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी- दारागंज प्रयाग (उत्तर प्रदेश)।
  2. श्री पंच अटल अखाड़ा- चैक हनुमान, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)।
  3. श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी- दारागंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)।
  4. श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती- त्रम्केश्वर, नासिक (महाराष्ट्र)
  5. श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा- बाबा हनुमान घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)।
  6. श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा- दशस्मेव घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)।
  7. श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा- गिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़ (गुजरात)

कुंभ में अखाड़े बैरागी वैष्णव संप्रदाय के तीन अखाड़े :

  1. श्री दिगम्बर अनी अखाड़ा- शामलाजी खाकचौक मंदिर, सांभर कांथा (गुजरात)।
  2. श्री निर्वानी आनी अखाड़ा- हनुमान गादी, अयोध्या (उत्तर प्रदेश)।
  3. श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा- धीर समीर मंदिर बंसीवट, वृंदावन, मथुरा (उत्तर प्रदेश)।

कुंभ में अखाड़े उदासीन संप्रदाय के तीन अखाड़े :

  1. श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा- कृष्णनगर, कीटगंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)।
  2. श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड)।
  3. श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड)।

अखाड़ों की स्थापना क्रम

अखाड़ों की स्थापना क्रम की बात करें तो अखाड़ों के शास्त्रों अनुसार सन्‌ 660 में सर्वप्रथम आवाह्‍न अखाड़ा, सन्‌ 760 में अटल अखाड़ा, सन्‌ 862 में महानिर्वाणी अखाड़ा, सन्‌ 969 में आनंद अखाड़ा, सन्‌ 1017 में निरंजनी अखाड़ा और अंत में सन्‌ 1259 में जूना अखाड़े की स्थापना का उल्लेख मिलता है। अखाड़ों का इतिहास लेकिन, ये सारे उल्लेख शंकराचार्य के जन्म को 2054 में मानते हैं। जो उनका जन्मकाल 788 ईसवीं मानते हैं, उनके अनुसार अखाड़ों की स्थापना क्रम चौदहवीं शताब्दी से प्रारंभ होता है। यही मान्यता उचित भी है।

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अखाड़ों की स्थापना क्रम वैष्णव अखाड़े : बाद में भक्तिकाल में इन शैव दसनामी संन्यासियों की तरह रामभक्त वैष्णव साधुओं के भी संगठन बनें, जिन्हें उन्होंने अणी नाम दिया। अणी का अर्थ होता है सेना। यानी शैव साधुओं की ही तरह इन वैष्णव बैरागी साधुओं के भी धर्म रक्षा के लिए अखाड़े बनें।

अखाड़ों का संचालन

अखाड़ों का संचालन एक अखाड़ा 8 खंडों और 52 केंद्रों में विभाजित होता है। प्रत्येक केंद्र की धार्मिक गतिविधियां एक महंत की देख रेख में होती है। अखाड़े की केंद्रीय प्रशासनिक अंग श्री पंच हैं जो ब्रहम , विष्णु ,शिव ,शकित और गणेश का प्रतिनिधित्व करते हैं। अखाड़े को चलाने वाले पांच सदस्यीय प्रशासनिक अंग का चुनाव प्रत्येक कुंभ मेले में होता है।

अखाड़ों का संचालन साधुओं की संख्या के आधार पर देखा जाए तो जूना अखाड़ा सबसे बड़ा है ,फिर निरंजनी एवं महानिर्वाणी। किसी अखाड़े के मुखिया को आचार्य महामंडलेश्वर कहते हैं , उनके अंतर्गत कई महामंडलेश्वर ,कमश: कई मंडलेश्वर एवं कई श्री महंत होते हैं।

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उदासीन अखाड़ा

साधुओं की अखाड़ा परंपरा के बाद में गुरु नानकदेव के सुपुत्र श्री श्रीचंद्र द्वारा स्थापित उदासीन संप्रदाय भी चला, जिसके आज दो अखाड़े कार्यरत हैं। एक श्रीपंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन अखाड़ा और दूसरा श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन। इसी तरह पिछली शताब्दी में सिख साधुओं के एक नए संप्रदाय, निर्मल संप्रदाय और उसके अधीन श्री पंचायती निर्मल अखाड़ा का भी उदय हुआ।अखाड़ों का इतिहास इस तरह कुल मिलाकर आज तेरह विभिन्न अखाड़े समाज और धर्म सेवा के क्षेत्र में कार्यरत हैं। इन सभी अखाड़ों का संचालन लोकतांत्रिक तरीके से कुंभ महापर्व के अवसरों पर चुनावों के माध्यम से चुने गए पंच और सचिवगण करते हैं।

कुंभ में अखाड़े से जुड़ी महत्‍वपूर्ण बातें

अटल अखाड़ा

यह अखाड़ा अपने आप पर ही अलग है. इस अखाड़े में केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य दीक्षा ले सकते है और कोई अन्य इस अखाड़े में नहीं आ सकता है.

अवाहन अखाड़ा

अन्‍य आखड़ों में महिला साध्वियों को भी दीक्षा दी जाती है लेकिन इस अखाड़े में ऐसी कोई परंपरा नहीं है.

निरंजनी अखाड़ा

यह अखाड़ा सबसे ज्यादा शिक्षित अखाड़ा है. इस अखाड़े में करीब 50 महामंडलेश्र्चर हैं.

अग्नि अखाड़ा

इस अखाड़े में केवल ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही दीक्षा ले सकते है. कोई अन्य दीक्षा नहीं ले सकता है.

महानिर्वाणी अखाड़ा

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा का जिम्‍मा इसी अखाड़े के पास है. यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है.

आनंद अखाड़ा

यह शैव अखाड़ा है जिसे आज तक एक भी महामंडलेश्वर नहीं बनाया गया है. इस अखाड़े के आचार्य का पद ही प्रमुख होता है.

दिंगबर अणि अखाड़ा

इस अखाड़े को वैष्णव संप्रदाय में राजा कहा जाता है. इस अखाड़े में सबसे ज्यादा खालसा यानी 431 हैं.

निर्मोही अणि अखाड़ा

वैष्णव संप्रदाय के तीनों अणि अखाड़ों में से इसी में सबसे ज्यादा अखाड़े शामिल हैं. इनकी संख्या 9 है.

निर्वाणी अणि अखाड़ा

इस अखाड़े में कुश्ती प्रमुख होती है जो इनके जीवन का एक हिस्सा है. इसी कारण से अखाड़े के कई संत प्रोफेशनल पहलवान रह चुके हैं.

बड़ा उदासीन अखाड़ा

इस अखाड़े उद्देश्‍य सेवा करना है. इस अखाड़े में केवल 4 मंहत होते हैं जो कभी कामों से निवृत्त नहीं होते है.

नया उदासीन अखाड़ा

इस अखाड़े में उन्‍हीं लोगों को नागा बनाया जाता है जिनकी दाढ़ी-मूंछ न निकली हो यानी 8 से 12 साल तक के.

निर्मल अखाड़ा

इस अखाड़ा में और अखाड़ो की तरह धूम्रपान की इजाजत नहीं है. इस बारे में अखाड़े के सभी केंद्रों के गेट पर इसकी सूचना लिखी होती है

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