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कब है अगला शाही स्नान, किस दिन से श्रद्धालु शुरू करेंगे कल्पवास

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में कुंभ मेले का आगाज हो गया है। यहां त्रिवेणी के किनारे कुम्भ लगा है। प्रयाग कुम्भ मेला अन्य कुम्भ मेलाओं की तुलना में सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसके पीछे कुछ आध्यात्मिक कारण हैं। माना जाता है कि यह कुंभ प्रकाश की ओर ले जाता है, यह एक ऐसा स्थान है जहां बुद्धिमत्ता का प्रतीक सूर्य का उदय होता है। यहां जिस स्थान पर कुंभ मेले का आयोजन होता है उसे ब्रह्माण्ड का उद्गम और पृथ्वी का केंद्र माना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि ब्रह्माण्ड की रचना से पहले ब्रम्हाजी ने यहीं अश्वमेघ यज्ञ किया था। मान्यता ये भी है कि इस यज्ञ के प्रतीक स्वरुप के तौर पर दश्वमेघ घाट और ब्रम्हेश्वर मंदिर अभी भी यहां मौजूद हैं। इनके कारण भी कुम्भ मेले का विशेष महत्व माना जाता है।

मंगलवार को मकर संक्रांति को पहला शाही स्नान हुआ जिसमे सबसे पहले अखाड़ों के साधु संतों ने आस्था की डुबकी लगाई।  मकर संक्रांति से ही सूर्य उत्तरायण होने लगता हैं। मकर संक्रांति के मौके पर हिन्दू धर्म के साधु-संन्यासी पहले शाही स्नान के लिए पहुंचे। ऐसी मान्यता है कि संगम में एक डुबकी लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं और लोगों को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

ये काल बेहद ही शुभ माना जाता है। इसलिए जब भी कुम्भ आयोजित होता है तो उसकी शुरूआत मकर संक्रांति से ही होती है। कुंभ के पहले शाही स्नान का काफी महत्व होता है इस दि गंगा में डुबकी लगाने से जन्मों जन्मों के पापों से तो छुटकारा मिलता ही है साथ ही मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। आइए आपको बताते हैं कुम्भ 2019 का अगला शाही स्नान के बारे में विस्तार से।

4 मार्च तक चलेगा कुम्भ

प्रयागराज में कुम्भ 15 जनवरी 2019 से शुरू हो चुका है और अब ये आयोजन 4 मार्च, 2019 तक चलेगा। कुम्भ का आयोजन करीब 50 दिन तक चलेगा और इस दौरान करोड़ों श्रद्धालुओं के यहां पहुंचने का अनुमान है।

क्या है शाही स्नान

इस बार कुम्भ में 8 शाही स्नान हैं। शाही स्नान पर खास मान्यता होती है। शाही स्नान वो खास स्नान हैं जिसमें तय मुहूर्त के दौरान सबसे पहले अखाड़ों के साधु संत बारी-बारी से स्नान करते हैं। और इनके स्नान के बाद ही आम लोग स्नान कर पाते हैं।

क्या है कल्पवास

कुंभ मेले के दौरान संगम तट पर कल्पवास का विशेष महत्व है. पद्म पुराण एवं ब्रह्म पुराण के अनुसार कल्पवास की अवधि पौष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी से प्रारंभ होकर माघ मास की एकादशी तक है.

कब है अगला शाही स्नान

पौष पूर्णिमा-21 जनवरी

पौष पूर्णिमा 21 जनवरी को है अगला शाही स्नानऔर इस दिन कुम्भ में दूसरा  बड़ा आयोजन होगा। पौष पूर्णिमा के दिन से ही माघ महीने की शुरुआत होती है। कहा जाता है आज के दिन स्नान ध्यान के बाद दान पुण्य करेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। भारतीय पंचांग के पौष मास के शुक्ल पक्ष की 15वीं तिथि को पौष पूर्णिमा कहते हैं. पूर्णिमा को ही पूर्ण चन्द्र निकलता है.

मौनी अमावस्या-4 फरवरी

कुंभ मेले में अगला शाही स्नान यानि चौथा शाही स्नान मौनी अमावस्या यानि 4 फरवरी को होगा। इसी दिन कुंभ के पहले तीर्थाकर ऋषभ देव ने अपनी लंबी तपस्या का मौन व्रत तोड़ा था और संगम के पवित्र जल में स्नान किया था। यह व्यापक मान्यता है कि इस दिन ग्रहों की स्थिति पवित्र नदी में स्नान के लिए सर्वाधिक अनुकूल होती है. इस दिवस पर मेला क्षेत्र में सबसे अधिक भीड़ होती है.

बसंत पंचमी-10 फरवरी

10 फरवरी को अगला शाही स्नान बसंत पंचमी यानि माघ महीने की पंचमी तिथि को मनाई जायेगी। बसंत पंचमी के दिन से ही बसंत ऋतु शुरू हो जाती है। कड़कड़ाती ठंड के सुस्त मौसम के बाद बसंत पंचमी से ही प्रकृति की छटा देखते ही बनती है। हिन्दू मिथकां के अनुसार विद्या की देवी सरस्वती के अवतरण का यह दिवस ऋतु परिवर्तन का संकेत भी है.

माघी पूर्णिमा-19 फरवरी

19 फरवरी को अगला शाही स्नान यानि छठां शाही स्नान माघी पूर्णिमा को होगा।माघ पूर्णिमा पर किए गए दान-धर्म और स्नान का विशेष महत्व होता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि माघी पूर्णिमा पर खुद भगवान विष्णु गंगा जल में निवास करते हैं। यह दिवस गुरू बृहस्पति की पूजा और इस विश्वास कि हिन्दू देवता गंधर्व स्वर्ग से पधारे हैं, से जुड़ा है.

महाशिवरात्रि-4 मार्च

कुंभ मेले का आखिरी शाही स्नान 4 मार्च को महा शिवरात्रि के दिन होगा। इस दिन सभी कल्पवासियों अंतिम स्नान कर अपने घरों को लौट जाते हैं। भगवान शिव और माता पार्वती के इस पावन पर्व पर कुंभ में आए सभी भक्त संगम में डुबकी जरूर लगाते हैं। मान्यता है कि इस पर्व का देवलोक में भी इंतज़ार रहता है। कहते हैं कि देवलोक भी इस दिवस का इंतजार करता है.यह दिवस कल्पवासियों का अन्तिम स्नान पर्व है और सीधे भगवान शंकर से जुड़ा है.

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